Tuesday, 23 July 2013

पहला कदम उठाने से पहले


                                                                                                        प्रिय दादू,
स्वैच्छिक कार्य के बारे में अल्का को आपके पत्र के लिए धन्यवाद। वह नौकरी पाने तक स्वैच्छिक कार्य करना चाहती थी। मेरा इरादा कोई व्यवसाय शुरू करने का है। क्या आप मुझे सलाह देना चाहेंगे।
 सप्रेम
विनोदिनी
प्रिय विनोदिनी,
अगर तुम सिर्फ  इसलिए कोई व्यवसाय शुरू करना चाहती हो, क्योंकि तुम्हें कोई नौकरी नहीं मिल रही है तब भी संभव है कि तुम व्यवसाय में सफल हो जाओ। परन्तु बेहतर तो यह होगा कि तुम सही कारण से व्यवसाय शुरू करो (नौकरी पाने में असमर्थता सही कारण नहीं है)।
व्यवसाय शुरू करने का सही कारण है कि तुम लाभ कमाते हुए समाज की अपूर्ण आवश्यकताओं की पूर्ति करना चाहती हो। ध्यान दो कि यहां दो बातें महत्वपूर्ण हैं। पहला लाभ और दूसरी अपूर्ण मांग।
कई लोग दूसरों की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं परन्तु वे लाभ कमाने के लिए ऐसा नहीं करते या फिर उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता की उन्हें लाभ हो रहा है या नहीं। ऐसे लोगों का व्यवसाय में सफल होना बहुत मुश्किल होता है-यद्यपि ऐसे लोग निस्संदेह भले होते हैं और मैं ठीक ऐसे ही लोगों को अपना दोस्त बनाना चाहूंगा। परन्तु क्या मैं उनके द्वारा शुरू किए गए व्यवसाय में अपना पैसा लगाना चाहूंगा ? हां, अगर मैं परोपकार करना चाहता हूंं़ तो। अगर मैं व्यापार या लाभ कमाने की दृष्टि से सोचूंगा तो मैं शायद ही उनके व्यवसाय में अपना पैसा लगाऊंगा।
लाभप्रदता, व्यवसाय में सफलता की अति आवश्यक शर्त क्यों है ? इसलिए, क्योंकि व्यापार, धन से जुड़ा हुआ है। अगर तुम लाभ नहीं कमाओगीे तो तुम्हारा व्यापार देर-सबेर बैठ जाएगा।
परन्तु यदि तुम्हें अपने व्यवसाय को लंबे समय तक चलाना है तो तुम्हें धन कमाने के बारे में सोचना ही होगा-बल्कि तुम्हें समाज की ऐसी कोई आवश्यकता ढूंढ निकालनी होगी जो अब तक कोई पूरी न कर रहा हो। जब तक वह आवश्यकता बनी रहेगी और तुम लाभ कमाते हुए उसकी पूर्ति करती रहोगी तब तक तुम्हारा व्यवसाय फलता-फूलता रहेगा।
अब प्रश्न यह है कि समाज में कई अपूर्ण आवश्यकताएं हैंं और तुम्हें-कम से कम शुरुआत में-उनमें से केवल एक पर फोकस करना होगा। दो या दो से अधिक पर क्यों नहीं ? इसलिए, क्योंकि किसी एक मांग की पूर्ति भी लाभप्रदता से कर पाना एक कठिन कार्य है और इस लेख को आगे पढऩे पर तुम्हें समझ में आ जाएगा कि मैं ऐसा क्यों कह रहा हूूं। किसी एक आवश्यकता को पूरी करने में सफलता के बाद तुम अपने व्यापार का विस्तार करने के बारे में सोच सकती हो...अगर ऐसा है तो मैं अपने अगले पत्र में तुम्हें यह बताऊंगा कि व्यापार का विस्तार करने का सबसे बेहतर तरीका क्या है।
तुम्हें किस आवश्यकता पर फोकस करना चाहिए ? यह एक जटिल प्रश्न है परन्तु इसका उत्तर ढूंढने की शुरुआत तुम इस प्रकार से कर सकती हो कि तुम स्वयं से पूछो कि क्या तुम उस आवश्यकता की पूर्ति कर सकती हो और दूसरा यह कि क्या उस आवश्यकता की पूर्ति करने का विचार तुम्हें रोमांचित करता है। अगर तुम्हें ऐसा लगता है कि तुम इस काम को-कम से कम शुरुआती एक या दो साल तक चौबीसों घंटे और उसके बाद कई सालों तक सप्ताह में छ: दिन कई घंटों तक-कर सकोगी। तभी इस बारे में आगे कुछ भी सोचने का अर्थ है, क्योंकि अपने व्यवसाय में व्यक्ति को किसी भी नौकरी की अपेक्षा कहीं ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है (अगर तुम किसी कार्यालय में काम करती हो तो तुम्हें वहां केवल तयशुदा घंटों तक काम करना पड़ता है और उसके बाद तुम अपने घर जा सकती हो और काम के बारे में तुम्हें कुछ भी सोचने की जरूरत नहीं होगी। परन्तु व्यवसाय में ऐसा नहीं होता। तुम्हारी चिंताएं तुम्हारे साथ चौबीसों घंटे रहेंगी)। जो कड़ी मेहनत तुम करोगी आगे चलकर उसके अनुरूप फायदा भी तुम्हें मिलता है, परन्तु कई बार,असफलता का डर तुम्हें कड़ी मेहनत करने पर मजबूर करता है, क्योंकि व्यापार में असफल हो जाना, स्कूल या कालेज की परीक्षा में फेल हो जाने से कहीं बढ़कर है। यहां तुम अपना-और यदि किसी दूसरे ने तुम्हारे व्यापार में धन लगाया है तो उसका भी-पैसा गंवा बैठोगी।
व्यवसाय में सफलता के संदर्भ में दूरगामी सोच रखना क्यों आवश्यक है ? इसलिए क्योंकि तुम नहीं चाहोगी कि तुम अपने जीवन के एक या दो या पांच या दस साल खर्च करके जो कुछ खड़ा करो, वह धूल में मिल जाए। तुम निश्चित रूप से चाहोगी कि वह कम से कम एक या दो पीढिय़ों तक तो चले और उसका विस्तार हो और वह लाभ कमाता रहे।
इसलिए, अगर तुम्हें ऐसी दो चीजें दिखती हैं जो तुम्हें रोमांचित करती हैं तो उन दोनों में से एक को चुनने का एक आधार यह हो सकता है कि किस व्यवसाय में तुम्हें ज्यादा लाभ होगा (इसके लिए तुम्हें कुछ हिसाब-किताब करना होगा और मैं किसी और पत्र में यह बताऊंगा कि यह कैसे किया जाता है)।
एक दूसरा आधार यह है कि क्या तुम्हारे पास इतना धन है कि तुम व्यवसाय शुरू कर सको और कम से कम एक या दो वर्षों तक उसे चला सको, ताकि तुम उस धंधे में जम जाओ (अधिकांश व्यवसायों में पहले साल नुकसान की गारंटी होती है। यद्यपि कुछ व्यवसायों में नुकसान उठाने की अवधि छ: महीने हो सकती है और कुछ में तीन साल भी)। इसके साथ साथ मैं तुम्हें सावधान भी करना चाहता हूं। यह जान लो कि अधिकांश व्यवसाय-लगभग 80 प्रतिशत-पहले तीन वर्षों में बंद हो जाते हैं।
इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि कोई व्यवसाय शुरू करने के पहले तुममें पर्याप्त उत्साह तो हो ही, तुम्हारे पास आवश्यक संसाधन भी हों।
पहली जरूरत है बाजार का अध्ययन और विश्लेषण करने की ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि तुमने जो व्यवसाय चुना है, वह सही है।
इस बारे में हम अपने अगले पत्र में चर्चा करेंगे।
                                                      सप्रेम

                                                                     दादू
                                                                  (Published in  Forward Press,  July, 2013 Issue)
Forward Press.

प्रेमचंद के विचारों का वास्तविक वाहक कौन ?

                                                                                                                          
प्रेमचन्‍द्र
मासिक पत्रिका हंस, जून 2013 के अंक में सृजन परिक्रमा के अंतर्गत अस्मितावादी राजनीति और साहित्य शीर्षक से दिनेश कुमार की रपट पढऩे को मिली। इस रपट, जिसमें सद्य: प्रकाशित कुछ पत्रिकाओं पर समीक्षात्मक टिप्पणियां की गई हैं, में उन्होंने मासिक पत्रिका फारवर्ड प्रेस, अप्रैल 2013 बहुजन साहित्य वार्षिकी के बारे में यह प्रतिक्रिया व्यक्त की है। प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन में सभापति के रूप में बोलते हुए प्रेमचन्द ने कहा था कि साहित्य राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं, बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती सच्चाई है। ऐसा कहकर प्रेमचन्द साहित्य और राजनीति के बीच के रिश्ते को भी परिभाषित कर रहे थे। हिन्दी में प्रेमचन्द की इस पंक्ति को तोतारटंत की तरह बार-बार दोहराया तो गया है पर व्यवहार में हमने ठीक इसके उलट ही किया है। क्या यह बतलाने की जरूरत है कि आज साहित्य पूरी तरह राजनीति का पिछलग्गू बन चुका है। साहित्य का उपयोग हम अपनी-अपनी राजनीति को मजबूत करने के लिए कर रहे हैं। क्या यह साहित्य का निम्नतर और दोयम दर्जे का उपयोग नहीं है, पर ऐसा लगता है कि अस्मितावादी राजनीति के गर्भ से पैदा हुए अस्मितावादी साहित्य वाले इस दौर में इस तरह के प्रश्न अप्रासंगिक हो गए हैं। एक सुचिंतित रणनीति के तहत साहित्य को राजनीति के अधीनस्थ बनाए जाने का उपक्रम किया जा रहा है। फारवर्ड प्रेस की बहुजन साहित्य वार्षिकी को इसी प्रयास के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। हंस के पृष्ठ 93 पर अपने कथन की सार्थकता को सिद्ध करने के लिए दिनेश कुमार ने आगे यह कहा है-यह देखना दिलचस्प है कि तुलसीराम से लेकर ओमप्रकाश वाल्मीकि तक लगभग सभी दलित रचनाकारों और विचारकों ने ओबीसी विमर्श को खारिज किया है और खगेन्द्र ठाकुर और चौथीराम यादव जैसे आलोचकों ने इसे अनुचित बताया है। 

दिनेश कुमार की टिप्पणी से लगता है कि उन्होंने साहित्य के वर्तमान परिदृश्य पर समग्र रूप से चिन्ता व्यक्त की है। लेकिन ऐसा नहीं है। यदि ऐसा होता तो वह हंस सहित उन सभी पत्रिकाओं पर समान प्रतिक्रिया व्यक्त करते, क्योंकि इनमें से कोई भी प्रेमचंद द्वारा अपेक्षित भूमिका का निर्वहन नहीं कर रही हैं। मैं दिनेश कुमार को चुनौती देता हूं कि वह अगला लेख लिखकर मुझे गलत साबित करें। सच तो यह है कि जाने-अनजाने फारवर्ड प्रेस ही प्रेमचन्द के उक्त कथन की अपेक्षाओं पर खरी उतर रही है। लेकिन दिनेश कुमार को यह दिखाई नहीं दे रहा है तो उनकी समझ पर तरस ही खाया जा सकता है। इस पर आगे चर्चा की जाएगी लेकिन उसके पहले उन लोगों के बारे में थोड़ा सा खुलासा समीचीन  होगा जिन्हें नाम के साथ इंगित किया गया है। 
तुलसीराम निश्चित ही एक ही बड़ा नाम है लेकिन साहित्यिक उपलब्धि के नाम पर उनके खाते में उनकी आत्मकथा के अतिरिक्त और क्या है ? वैसे भी वह साहित्यकार कम राजनीतिक चिंतक अधिक हैं। यह बात उनके द्वारा दिए गए उत्तर से ही स्पष्ट है। उनकी आत्मकथा के चर्चित होने के पीछे सबसे बड़ा हाथ नामवर सिंह का है, जिन्होंने उसकी प्रशंसा कर दी। फिर क्या था। सारी भक्तमंडली जय-जयकार करने लगी। तुलसीरामजी स्वत: अपनी आत्मकथा को लेकर मुग्धता के शिकार हैं जो निश्चित ही उनके निष्पक्ष चिंतन पर सवालिया निशान लगाता है। वैसे भी यह जगजाहिर है कि वह नामवर सिंह के पिछलग्गू हैं और नामवर दलित और स्त्री विमर्श को घृणित कृत्य मानते हैं। इसलिए उनकी बातों को गम्भीरता से लेने की जरूरत नहीं है। उन्हें दलित और दलित साहित्य से उसी प्रकार वितृष्णा है जैसी उनके अगुवा को है। 
जहां तक ओमप्रकाश वाल्मीकि का सवाल है तो उन्होंने ओबीसी विमर्श को खारिज नहीं किया है। यह बात उनके इस कथन से स्पष्ट है-मैं यह कहना चाहूंगा कि इस तरह के प्रयास सार्थक हैं, क्योंकि यह पत्रिका पिछड़े, दलितों की आवाज बुलंद कर रही है। वर्तमान में जिसकी बहुत जरूरत है। ऐसा कदम उठाने और ऐसी कोशिश करने से ही सामाजिक परिवर्तन सम्भव है। पत्रकारिता के क्षेत्र में यह पत्रिका निश्चित रूप से एक दिन मील का पत्थर साबित होगी। फारवर्ड प्रेस, अप्रैल 2013, पृष्ठ 51 पर यदि उन्होंने ओबीसी के लोगों को दलित साहित्य को समझने की सलाह दी है तो इससे यह मतलब तो नहीं निकलता कि उन्होंने ओबीसी विमर्श को खारिज कर दिया।
खगेन्द्र ठाकुर के लेख का क्या मंतव्य निकाला जाए, यही स्पष्ट नहीं है। वह भी प्रगतिशील लेखक संघ की उसी प्रजाति के हैं जो अपनी आंखों पर प्रेमचन्द का चश्मा लगाकर पैदा होते हैं। उनको फारवर्ड प्रेस के अभियान से कुछ लेना-देना नहीं है। जब उनके आराध्य ही दलित बहुजन के नायक और उनके साहित्यिक-सामाजिक योगदान से अनभिज्ञ थे तो उनकी परम्परा पर चलने वाले खगेन्द्र ठाकुर से कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वह अपने ज्ञान का विस्तार करें। वह प्रेमचन्द की परम्परा को अतिक्रमित करने का साहस भी नहीं कर सकते। चौथीराम यादव ने अपने लेख के केन्द्र में केवल दलित विमर्श को रखा है। उनके कथन का स्पष्ट आशय यह है कि कोई भी लेखक किसी भी विषयवस्तु पर रचना कर सकता है, जाति के आधार पर इसका एकाधिकारी बंटवारा अनुचित है। दिनेश कुमार इसे समझ नहीं पाये।
दिनेश कुमार ने जब प्रेमचन्द को याद किया है तो उन्हें प्रगतिशील लेखक संघ के इतिहास के बारे में भी पता होगा। क्या वह किसी ऐसे कालखंड को रेखांकित कर सकते हैं जब राजनीति ने साहित्य की अधीनता स्वीकार की हो। वास्तविकता यह है कि एक से एक दिग्गज साहित्यकार पार्टी के कोपभाजन बनकर निकाल दिए गए। यह सिलसिला पिछली राष्ट्रीय कार्यकारिणी के गठन के समय भी बदस्तूर देखने को मिला जब शमीम फैजी ने अपने राजनीतिक आतंक के बल पर राष्ट्रीय महासचिव का चुनाव करवा दिया था। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के विभाजन के कारण प्रगतिशील लेखक संघ भी बंट गया था, इसे भी दिनेश कुमार जानते होंगे।
इतना तो स्पष्ट है कि दिनेश कुमार फारवर्ड प्रेस के नियमित पाठक नहीं हैं, अन्यथा इसके बारे में उनकी वही राय होती जैसी वह चाहते हैं। वह यह देखकर प्रसन्न होते यह पत्रिका राजनीति को लगातार आईना दिखाते हुए उसके सामने मशाल लेकर चलती हुई सच्चाई की भूमिका में ही है। सरकारी कमियों को, कमजोरियों को, फर्जी आंकड़ेबाजी को, थोथी दलीलों को, खोखले व झूठे वादों को उजागर कर सरकार को कठघरे में खड़ा कर रही है। इस पत्रिका का सबसे बड़ा योगदान यह है कि यह सांस्कृतिक क्रान्ति के बहुत बड़े गैप को भरने का काम कर रही है। बहुजन समाज की सभ्यताएं, संस्कृति और इतिहास को सामने ला रही है। सामाजिक न्याय के बहुजन पुरोधाओं के महत्व को इनके बीच स्थापित कर रही है। इसकी ओर न तो प्रेमचन्द का ही ध्यान गया था और न उनके अनुयायी ही इनका संज्ञान ले रहे हैं। वे केवल सामाजिक न्याय की लकीर पीट रहे हैं। उन्हें डर है कि दलित और स्त्री विमर्श की मार तो वे झेल ही नहीं पा रहे हैं, ओबीसी विमर्श स्थापित हो गया तो उनका क्या हश्र होगा। फारवर्ड प्रेस का अभियान समय की सबसे बड़ी मांग है। निश्चित रूप से यह सांस्कृतिक क्रान्ति की पूरक है जो अंतत: बहुजन समाज में वैचारिक साम्यता स्थापित करके उन्हें एक मंच पर लाने में सफल होगी और राजनीतिक तिकड़म और सौदेबाजी की धार भी कुंद होगी। फिर सबसे अहम सवाल तो यही है कि जब ओबीसी विमर्श आकार ले रहा है तो कोई अन्य विमर्शकार चाहे वह दलित हो, चाहे गैर दलित इसके विरुद्ध स्थगनादेश देने वाला कौन होता है ? यदि ये महानुभाव इस प्रकार की टिप्पणियों में अपना समय बर्बाद करने के स्थान पर हिन्दू धर्मग्रन्थों और उनसे प्रेरित साहित्य के विनाश-बहिष्कार का अभियान चलाते तो देश और समाज की सूरत बदल जाती। दिनेश कुमार यदि इस देश के समाज का मर्ज समझ जाएं तो उन्हें प्रेमचन्द का अंधानुकरण करने की निरर्थकता भी स्वीकार करने में देर नहीं लगेगी।
                                                                                                          -मूलचंद सोनकर     
(मूलचंद सोनकर सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता हैं तथा दलित मुददों पर अपनी उल्लेखनीय टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं)
                                                            (Published in  Forward Press,  July, 2013 Issue)
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Monday, 22 July 2013

चार वर्षीय कोर्स : डिग्री नहीं ज्ञान चाहिए!

                                                                                                            अशोक चौधरी 
दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रस्तावित चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम को लेकर विरोध लगातार गहराता जा रहा है। विश्वविद्यालय के अध्यापकों के बाद अब राजनेता और सामाजिक कार्यकर्ता भी विरोध के सुर में सुर मिलाने लगे हैं। 31 मई को दिल्ली में ज्वाइंट एक्शन फ्रंट फॉर डेमोक्रेटिक एजुकेशन; अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ा वर्ग एवं वामपंथी पार्टियों द्वारा आयोजित एक सेमिनार में शिक्षाविद् प्रो यशपाल, जानी-मानी लेखिका अरुंधती रॉय, जेएनयू की प्रोफेसर जयंति घोष, हैदराबाद विश्वविद्यालय के प्रो हरगोपाल, जनता दल यू के अध्यक्ष शरद यादव, सीपीएम नेता सीताराम येचुरी और इंडियन जस्टिस पार्टी के प्रमुख उदितराज ने इसका विरोध करते हुए कहा कि बिना बहस किए शिक्षा में बदलाव लाना गरीब, दलित, ओबीसी, हिंदी भाषी विद्यार्थियों के साथ सरासर धोखा है।
इन लोगों का तर्क है कि यदि 4 वर्ष का स्नातक पाठ्यक्रम लागू हो जाता है तो इन तबकों के विद्यार्थियों पर अर्थिक बोझ बढ़ेगा। इनका सरोकार वाजिब है। सभी को विश्वास में लेकर बदलाव किया जाए। यह लोकतंत्र के लिए आवश्यरक होना चाहिए। लेकिन अगर आपको नहीं पूछा गया तो आप विरोध पर उतारू हो जाएं इसे बुद्धिमानी नहीं कहा जा सकता। हम दलित, ओबीसी के लिए कैसी शिक्षा चाहते हैं, उन्हें काबिल बनाना चाहते हैं या डिग्री देना चाहते हैं। इसी तरह कुछ वर्ष पहले तक दलितों के शुभचिंतक समाजवादी अंग्रेजी भाषा का विरोध किया करते थे और उन्होंने इसे विभिन्न कक्षाओं से अनिवार्य विषय के रूप में हटवा कर ही दम लिया। उनका तर्क था कि इससे गांवों के गरीब बच्चे फेल हो जाते हैं। उनका तर्क निराधार नहीं था लेकिन क्या आज कोई यह कह सकता है कि अंग्रेजी से दूर होने के अच्छे  नतीजे आए हैं। बिहार के एक सत्ताधारी राजनेता ने कुछ साल पहले इसी तर्क पर मैट्रिक में नकल की खुली छूट दे दी थी।
चार वर्ष के कोर्स के तहत प्रथम वर्ष में 11 फाउंडेशन कोर्स पढ़ाए जाने हैं, जिनमें अंग्रेजी, गणित एवं विज्ञान अनिवार्य हैं। इसके अलावा भी इस व्यवस्था में कई और खूबियां हैं। यह एक अच्छी पहल है। वंचित तबकों से आने वाले विद्यार्थियों का फाउंडेशन प्राय: कमजोर होता है। उन्हें इस बदलाव का अधिक लाभ मिलेगा, जिन्हें इस सिलसिले में मदद की जरूरत है उनके लिए नि:शुल्क कोचिंग की व्यवस्था की जा सकती है। जैसे कि कुछ आईआईटी में है। दलित, ओबीसी मुख्यत: श्रमशील वर्ग से आते हैं और इसमें शक नहीं कि चार साल का कोर्स उनपर आर्थिक बोझ बढाने वाला साबित होगा। इसलिए मांग यह की जानी चाहिए कि एमफिल, पीएचडी के लिए मिलने वाले जुनियर रिसर्च फेलोशिप की तर्ज पर स्नातक कक्षाओं में पहुंचने वाले दलित-ओबीसी विद्याथियों को पर्याप्त वजीफा दिया जाए।
                                                            (Published in  Forward Press,  July, 2013 Issue)
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