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Monday, 21 April 2014

आंखों के सामने हुआ नामकरण

हरेराम सिंह
हिंदी साहित्य जगत में पिछले कुछ समय से ओबीसी साहित्य की चर्चा आरंभ हुई है। इसे लेकर अनेक मत सामने आ रहे हैं। इस अवधारणा के विरोधियों का कुतर्क है कि 'ओबीसी साहित्य' की अपनी कोई सैद्धांतिकी नहीं है, जबकि अनेक विद्वानों ने सुचिंतित तर्कों द्वारा यह साबित किया है कि ओबीसी साहित्य की अवधारणा का जन्म अनायास नहीं हुआ है, इसके पीछे कबीर, मखली गोसाल, जोतिबा फू ले आदि अनेक असाधारण चिंतकों का वैचारिक बल है।
और इस तरह हम देखते हैं कि हिंदी में ओबीसी साहित्य और बहुजन साहित्य की कोटि प्रस्तुत करनेवाली पहली पत्रिका 'फारवर्ड प्रेस' बनी।

पत्रिका की 'बहुजन साहित्य वार्षिकी 2013' में प्रबंध संपादक प्रमोद रंजन ने लिखा है कि 'बहुजन साहित्य' की अवधारणा का जन्म 'फारवर्ड प्रेस' के संपादकीय विभाग में हुआ तथा इसका श्रेय हमारे मुख्य संपादक आयवन कोस्का, आलोचक व भाषाविज्ञानी राजेन्द्र प्रसाद सिंह तथा लेखक प्रेमकुमार मणि को है और आयवन कोस्का ने 'बहुजन साहित्य वार्षिकी 2012' में इसकी पुष्टि भी की है। अपने संपादकीय में उन्होंने लिखा है कि 'पिछले साल जुलाई में प्रोफेसर राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने 'ओबीसी साहित्य' पर अपने आलेख के द्वारा इस विमर्श की शुरु आत की थी। दरअसल यह आलेख 'ओबीसी साहित्य की अवधारणा'है जो 'फारवर्ड प्रेस' के जुलाई, 2011 अंक में प्रकाशित है। मराठी में ओबीसी साहित्य का जन्म पहले हो चुका था।' आयवन कोस्का ने 'फ ारवर्ड प्रेसÓ के जुलाई, 2011 के संपादकीय में लिखा है कि फ रवरी, 2008 में मुझे नासिक में दूसरे अखिल भारतीय ओबीसी साहित्य सम्मेलन में वक्तव्य देने के लिए निमंत्रित किया गया था और उस दौरान मुझे यह अहसास हुआ कि उस मराठी जमावड़े में शायद ही किसी को मालूम था कि 'ओबीसी साहित्य' किस बला का नाम था, है या होना चाहिए,मराठी में भी।....... बिहार के प्रोफेसर राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने ओबीसी साहित्य पर एक संजीदा लेख लिखा है। ओबीसी साहित्य विषय पर गंभीर चर्चा एवं बहस की शुरुआत करने हेतु 'फारवर्ड प्रेस' यह आलेख प्रस्तुत करते हुए फ ख्र महसूस करती है। 'मोहल्ला लाइव' ने प्रस्तुत लेख को 'ओबीसी साहित्य का मैनिफेस्टो'ट कहते हुए इस पर बहस चलाई।

'फारवर्ड प्रेस' के सिंतबर, 2011 अंक में ललन प्रसाद सिंह ने 'ओबीसी साहित्य : माक्र्सवादी परिप्रेक्ष्य' शीर्षक आलेख लिखा। इसमें उन्होंने बताया कि न्याय के लिए संघर्ष तो ओबीसी की नियति है। उसी संघर्षशील सांस्कृतिक चेतना की सृजनात्मक तथा आलोचनात्मक अभिव्यक्ति ओबीसी साहित्य में होती है। इसी अंक में आयवन कोस्का, प्रमोद रंजन, राजेन्द्र यादव एवं संजीव का ओबीसी साहित्य पर आपसी विमर्श छपा है। इस विमर्श में राजेन्द्र यादव ने कहा कि ओबीसी साहित्य नामक जैसी कोई चीज नहीं है। परंतु संजीव ने माना कि विमर्श शुरू होना चाहिए।

'फारवर्ड प्रेस' के नवंबर, 2011 अंक में ओबीसी साहित्य पर दो आलेख आए। एक कंवल भारती का और दूसरा प्रेमकुमार मणि का। प्रेमकुमार मणि ने स्वीकारा है कि आज जो ओबीसी साहित्य की बात उठ रही है उसके पीछे दलित साहित्य की संकीर्णतावादी सोच है। इसे मिल-बैठकर, विमर्श कर दूर करना ही श्रेयस्कर है। कंवल भारती ने लिखा है कि सिद्धांत और व्यवहार पक्ष में दलित और ओबीसी धारा समान हैं-दोनों का ही लक्ष्य जातिविहीन समाज की स्थापना करना है। इसलिए दलित साहित्य ओबीसी साहित्य का स्वागत करेगा।
'बहुजन साहित्य वार्षिकीÓ 2012 में राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने बहुजन साहित्य को परिभाषित करते हुए लिखा कि वस्तुत: बहुजन साहित्य एक व्यापक अवधारणा है जैसे भक्ति काव्य। भक्ति काव्य में जैसे संत, सुफी, राम और कृष्ण काव्यधाराओं का समाहार है, वैसे ही बहुजन साहित्य में भी ओबीसी, दलित, आदिवासी और एक सीमा तक स्त्री विमर्श की साहित्य धाराओं का समाहार है। प्रमोद रंजन ने 'बहुजन साहित्य वार्षिकीÓ 2013 में दूसरे शब्दों में स्पष्ट किया कि 'बहुजन साहित्य को उस बड़ी छतरी की तरह देखा जाना चाहिए जिसके अंतर्गत दलित साहित्य के अतिरिक्त शूद्र साहित्य, आदिवासी साहित्य तथा स्त्री साहित्य आच्छादित है। आंबेडकरवादी साहित्य, ओबीसी साहित्य आदि जैसी अनेक शब्दावालियों, विचार, दृष्टिकोण इसके आंतरिक विमर्श में समाहित है।'
'फारवर्ड प्रेस' के फरवरी, 2012 अंक में अभय कुमार दुबे ने यह विचार रखा कि पिछड़े वर्ग का अपना कोई अलग साहित्य नहीं है, न ही उनके पास अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां है। राजेन्द्र प्रसाद सिंह के दो आलेख अगस्त, 2012 एवं सितंम्बर, 2012 के फारवर्ड प्रेस में प्रकाशित हुए-ओबीसी नवजागरण का प्रथम चरण तथा ओबीसी नवजागरण का दूसरा चरण। इन लेखों में स्पष्ट किया गया कि भारतीय इतिहास में कई चरणों एवं कई रूपों में ओबीसी नवजागरण उपलब्ध है। अगस्त, 2012 के 'फारवर्ड प्रेस' में बजरंग बिहारी तिवारी ने स्वीकार किया कि राजेन्द्र प्रसाद सिंह 'ओबीसी साहित्य' के मान्य सिंद्धातकार हैं और उनका स्थान ओबीसी साहित्य में वही है जो दलित साहित्य में डॉ. धर्मवीर का है। 'बहुजन साहित्य वार्षिकी 2012' में वीरेंद्र यादव ने लिखा कि जब साहित्य की मुख्यधारा बहुजन समाज के सरोकारों से जुडऩे का जतन कर रही हो, तब 'ओबीसी साहित्य' की किसी भी अवधारणा की न तो कोई आवश्यकता है और न कोई औचित्य। परंतु इतना तो तय है कि बहुजन समाज के सरोकारों की ही एक धारा ओबीसी साहित्य है।
जयप्रकाश कर्दम ने 'दलित साहित्य 2012' की वार्षिकी में ओबीसी साहित्य पर संपादकीय लिखते हुए अपना मत दिया है कि गत् वर्ष के दौरान हिंदी साहित्य में जो भी बहस चली है, उसमें सर्वाधिक उल्लेखनीय राजेन्द्र प्रसाद सिंह द्वारा ओबीसी साहित्य को लेकर शुरू की गई बहस है.......यदि ओबीसी लेखक पृथक ओबीसी साहित्य की स्थापना करना चाहते हैं तो यह आपत्तिजनक नहीं है। महत्वपूर्ण है उनका ब्राह्मणवादी-सामंतवादी साहित्य और साहित्यकारों के प्रभाव और छाया से बाहर निकलना। जाहिर है कि कंवल भारती और जयप्रकाश कर्दम जैसे दलित सरोकारों के विचारकों ने ओबीसी साहित्य को कुछेक शर्तों के साथ मान्यता दी है। जबकि ओमप्रकाश वाल्मीकि ने इसका विरोध किया है। उनका मानना है कि आज भी ओबीसी में जन्मा रचनाकार अपने को ओबीसी कहलाने में अपमान समझता है। जबकि दलित सरोकारों के रचनाकार अपने को दलित लेखक कहने में गर्व महसूस करते हैं।
हिंदी के प्रखर आलोचक तथा 'फारवर्ड प्रेस' के प्रबंध संपादक प्रमोद रंजन ने ओबीसी साहित्य/बहुजन साहित्य पर कई विचारोतेजक लेख लिखे हैं। उनका एक महत्वपूर्ण लेख 'आज के तुलसीगण' है। रमणिका गुप्ता ने माना है कि दलित साहित्य प्रचुर मात्रा में आ चुका है। पिछड़ा साहित्य इसमें इजाफा ही करेगा। वे तो अपनी पत्रिका 'युद्धरत आम आदमी'का ओबीसी विशेषांक प्रकाशित करने की तैयारी में हैं। इधर 24-25 मई, 2013 को हरिनारायण ठाकुर ने बारा चकिया; बिहार में यूजीसी प्रायोजित एक राष्ट्रीय संगोष्ठी करवाई। इसमें ओबीसी साहित्य पर भी गंभीर विमर्श हुआ। कहना न होगा कि ओबीसी साहित्य अब स्थापित हो चुका है। इसे उखाड़ फेंकना आसान नहीं होगा।
-'फारवर्ड प्रेस साहित्य एवं पत्रकारिता सम्मान : 2013' से सम्मानित हरेराम सिंह कवि और आलोचक हैं। यह पुरस्कार फारवर्ड प्रेस पाठक क्लब, सासाराम की ओर से फारवर्ड प्रेस में प्रकाशित बहुजन लेखक/पत्रकार की श्रेष्ठ लेख/रिपोर्ट के लिए दिया जाता है
                                                                (Published in  Forward Press, January 2014 Issue)

Forward Press.

'मैं मुलाना,मुफ़्ती चक्‍कर में नहीं रहता'

बाबा साहब भीमराव आम्बेडकर ने कभी कहा था कि 'हिन्दू दलितों से मुसलमान दलितों की स्थिति बदतर है।'वह परिस्थिति आज भी लगभग जस की जस बनी हुई है। पसमांदा मुसलमानों ने अपनी आवाज बुलंद करने के लिए 1998 में 'ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज' का गठन किया था। बिहार विधान परिषद् के उपसभापति सलीम परवेज इस संगठन के अध्यक्ष रहे हैं। पसमांदा समाज के बाबत उनसे अनेक पहलुओं पर बातचीत की है फारवर्ड प्रेस के छपरा संवाददाता अमलेश प्रसाद ने। बातचीत के अंश प्रस्तुत हैं...

पसमांदा समाज से निकलकर बिहार विधान परिषद् के उपसभापति पद तक का सफर कैसा रहा ? 
मेरा संयुक्त परिवार था, जो बढ़ती पर ही टूट गया और मुझे सऊदी अरब जाना पड़ा। छह साल तक एक कंपनी में काम किया। वहीं 1990 में अपना कारोबार शुरू किया लेकिन हमेशा अपने गांव की गरीबी, बदहाली याद आती रही। 2000 में अपने गांव वापस आया। 'सर्विस टू यूनिटी, सर्विस टू गॉड' को अपनी जिंदगी का उद्देश्य बना लिया। अरब से जो पैसा मिला, उसे पसमांदा समाज के लोगों की शादी, बच्चों की पढ़ाई में लगाया। 2009 में हालात कुछ ऐसे आ गए कि मुझे बसपा से छपरा लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लडऩा पड़ा। चुनाव हार गया, लेकिन हिम्मत नहीं हारी। इसी बीच नीतीश जी का निमंत्रण मिला और मैं विधान पार्षद् बन गया। 2010 में बिहार विधान सभा के चुनाव मैं मैंने नीतीश जी को पूरी मदद की, जिसके पुरस्कारस्वरूप मुझे बिहार विधान परिषद् के उपसभापति का पद मिला। हिन्दुस्तान में मैं अंसारी परिवार का पहला व्यक्ति हूं जिसे यह पद मिला है।    

समाज सेवा/व्यवसाय के क्षेत्र से राजनीति में क्यों आए ?
जब मैं पढता था तब मेरे बड़े जीजा डॉ. शार्दूल हक ने मेरा नामांकन दाता मेडिकल कॉलेज में करवा दिया था, लेकिन मेरे पास पढऩे के लिए पैसे नहीं थे और मुझे सऊदी अरब जाना पड़ा। मैंने बहुत नजदीक से गरीबी देखी है। जब मेरी आर्थिक स्थिति ठीक हुई, मेरी अंतरात्मा ने आवाज दी-'गांव चलो और बदहाल लोगों की सेवा करो।'आज भी मैं अपने को एक समाजसेवी ही समझता हूं, न कि विधान पार्षद् और न ही उपसभापति।

पसमांदा समाज के खस्ताहाल के लिए किसको जिम्मेदार मानते हैं ?
खस्ताहाल के लिए हम खुद जिम्मेदार हैं। हमें हर तरह से शिक्षित नहीं करने की साजिश की गई। मैंने ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज को एक गाड़ी दी है, जिस पर लिखा है 'आधी रोटी खाएंगे, बच्चों को पढ़ाएंगे।'हमारे बीच तालीम की कमी है। हमें खानों-खानों में बांटा गया। जाति के नाम पर, धर्म के नाम पर डराया गया, लेकिन इस सरकार की देन है कि लोग अब अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं। तालीम से ही हालात सुधरेंगे।
 
पसमांदा समाज के लिए नीतीश सरकार ने क्या योजनाएं लागू की हैं ? 
हम पसमांदा लोग ही नहीं, बल्कि पूरे बिहारवासी खुशनसीब हैं कि आजादी के बाद पहली बार नीतीश कुमार जैसा मुख्यमंत्री मिला है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि उन्होंने बच्चों में आत्मनिर्भरता पैदा की है। दसवीं पास बच्चियों के लिए नीतीश जी ने दस हजार वजीफा देने की घोषणा की है। इससे स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़ी है। 2,459 मदरसों को मंजूरी मिली है। अब बच्चों को किताबें, कॉपी व पोशाक और तालीमी मरकज सेवकों का वेतन मिलने लगा है।

नीतीश सरकार में एक भी मंत्री पसमांदा समाज का नहीं है ? यहां तक कि मुसलमानों के सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक व धार्मिक संस्थाओं का अध्यक्ष भी कोई पसमांदा नहीं है ? 
नीतीश जी सोशल इंजीनियरिंग के माहिर आदमी हैं। वो काम चाहते हैं। आजतक किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री ने इतनी इज्जत नहीं दी, जो इज्जत पसमांदा समाज को उन्होंने दी है। मैं पसमांदा समाज का पहला आदमी हूं, जो इस संवैधानिक पद पर बैठा हूं।

कुछ लोग कहते हैं कि आरक्षण इस्लाम के विरुद्ध है। हैदराबाद के एक मुफ्ती का कहना है कि पसमांदा समाज को आरक्षण देना हराम है ? 
मैं कभी मौलाना और मुफ्ती के चक्कर में नहीं रहता। किसी मुफ्ती के कहने से यह बात तय नहीं हो सकती। हां, संविधान में धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं है लेकिन हम सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षणिक रूप से पिछड़े हैं। हमारी मांगें संवैधानिक हैं। हम उसे लेकर रहेंगे। किसी मुफ्ती के कहने से मेरा मिशन थोड़े कम हो जाएगा।

आपने कई मुस्लिम देशों की यात्रा की है। उनकी तुलना में भारत के मुसलमानों की स्थिति कैसी है ?
मैं खुशनसीब हूं कि मैं भारत में हूं। अन्य मुस्लिम देशों की तुलना में यहां के मुसलमान लाख दर्जे अच्छे हैं। मैंने पाकिस्तान, मलेशिया, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, कतर, ओमान, कुवैत आदि देशों की यात्रा की है। खासकर बिहार में मुसलमान सुकून से रहते हैं।

आप बिहार एथलेटिक्स एसोसिएशन के अध्यक्ष भी हैं। खेल के क्षेत्र में बिहार का प्रदर्शन इतनी दयनीय क्यों है ?
2005 के पहले इस संस्था को कोई जानता भी नहीं था। अभी बहुत काम करना है। मैंने सरकार की मदद से छपरा में एक सिंथेटिक मैदान बनाने का संकल्प लिया है, ताकि सारण प्रमंडल में खेल के क्षेत्र में क्रांति आए और हमारे खिलाड़ी देश-विदेश में खेलने जाएं। अब बिहार का खेल बजट दस गुना से ज्यादा हो गया है।

बिहार विधान परिषद् सचिवालय में हुई नियुक्तियों पर कई सालों से अवैध होने का आरोप लगते रहे हैं ?
कोई भी नियुक्ति अवैध नहीं होती है। मामला यह होता है कि जगह 7 लोगों की होती है और बहाल 10 हो जाते हैं, और उनमें से 3 लोगों को काम करने से मना कर देने पर वही 3 लोग तरह-तरह के आरोप लगाने लगते हैं।

जब नियुक्ति अवैध नहीं होती तो 2006 में तत्कालीन सभापति जाबिर हुसेन के कार्यकाल में नियुक्त किए गए दलित-बहुजनों को बर्खास्त कैसे किया गया ?
जब तक मैं सभापति के प्रभार में रहा तब तक मेरे पास ऐसी कोई फाईल नहीं आई। अब मैं उपसभापति के रूप में वहां हूं। इस संबंध में अगर आप वर्तमान सभापति अवधेश नारायण सिंह से ही बात करें तो बेहतर होगा। मेरे पास इस संबंध में कोई जानकारी नहीं है।
                                           (Published in  Forward Press, January 2014 Issue)

Forward Press

Thursday, 27 March 2014

BY CHOOSING TO OPEN THEIR SCHOOLS IN PUNE, THE PHULES WERE SENDING OUT A CLEAR MESSAGE THAT THEY WERE STRIKING AT THE VERY ROOT OF BRAHMANISM

Savitribai Phule, born on 3 January 1831 at a village called Nayagaon in Satara district of Maharashtra, planted a little sapling on the barren land of women’s education and nursed it till it turned into a lush green tree. Education had been kept out of reach of the exploited and deprived Dalit tribals and women of the country for centuries. Her simplicity, selfless love, hardwork and commitment stood out as Savitribai, in partnership with her husband Jotiba Phule, secured the right to education for these communities. She demolished the conspiratorial monopoly of the upper castes on education. In a country where awards are instituted in the name of the person who demanded Eklavya’s thumb as ‘gurudakshina’ (gift to the guru), where the slaying of a Shudra ascetic like Shambuk was a tradition, where thescriptures prescribed that hot mercury be poured into the ears of Shudras-Atishudras and women trying to acquire education, where the poet of the so-called Brahmanical society prescribed that ‘Dhol, Ganwar, Shudra, Pashu, Nari; Yeh Sab Taadan Ke Adhikari’ (Drum, rustics, Shudras, animals and women deserve to be beaten) – in such a country, it was nothing short of a miracle that a Shudra woman became the first non-missionary citizen to ignite the light of education for women and the Dalits. Unfortunately, in a countrywhere ‘Jati Na Pucho Sadhu Kee, Puch Lijiye Gyan’ (Don’t ask the caste of a sadhu, ask how wise he is) is a maxim, education has come to be inextricably linked with one’s caste. If that is not so, why is Teacher’s Day celebrated in the name of Sarvapalli Radhakrishnan and not Savitribai Phule? Isn’t Savitribai’s contribution to the field of education momentous? Savitribai Phule was not only the first non-missionary Indian woman teacher and headmistress but also a great social reformer and an enlightened poet and thinker. She has become a source of inspiration to many.
In Savitribai’s time, religious superstitions, bigotry and untouchability ruled the roost. Dalits and women were subjected to all sorts of mental and physical torture: Child marriage, sati, female infanticide and inhuman treatment of widows were common. Young women were married off to much older men and polygamy was the order of the day.Against this backdrop, Savitribai and Jotiba standing up to the unjust society was akin to stirring a cesspool of stagnant,stinking water.Education Savitribai Phule kicked open the doors of education, which were closed for Shudras-Atishudras and women for hundreds of years. The Sanatanis of Pune did not take kindly to the news of these doors being thrown open. They mounted murderous assaults on Savitri and Jotiba Phule. To extinguish the lamp of education lit by the Phule couple, they provoked Jotiba’s father Govindrao to turn the couple out of his home. They hurled cow dung and stones at Savitribai whenever she left her home to teach the girls. Upper caste goons stopped her on the way and abused her. She was threatened with death. Many
attempts were made to close the school for girls. The Sanatanis wanted Savitribai to confine herself to her home. One goon followed Savitribai daily and taunted and harassed her. One day, he crossed all limits - he blocked her way and tried to hit her. Savitribai courageously retaliated and slapped him hard thrice. The man was so embarrassed that he never again came in her way. And so Jotiba and Savitribai continued with their work. Under the Brahmin Peshwa rulers untouchability had taken on the most cruel, inhuman forms in Pune and the surrounding areas. By choosing to open their schools in Pune, the Phules were sending out a clear message that they were striking at the very root of Brahmanism. That in such a casteist context a Shudra couple like the Phules were able to start and sustain several schools for girls of all castes including from the untouchable communities was nothing short of a social revolution. This kind of sweeping change had no precedent in India’s history. Despite their seminal contribution to social change, the arrogant upper castes have not given them their due place in our history. It is a matter of great satisfaction and joy that the Dalit-OBCs are rewriting history and making the world aware of the contribution of the Phules. The Phules’ selfless mission has become the guiding light of many a member of the deprived classes. Inspired by them, schools and colleges are being established in their names, thus extending financial, social and emotional support to the students of these classes. Six girls took admission in the first school opened at Bhide Wada, Budhwar Peth, in Pune in 1848. They were aged between four and six. Their names were Annapurna Joshi, Sumati Mokashi, Durga Deshmukh, Madhavi Thatte, Sonu Pawar and Jani Kardile. While Savitribai started classes for these six girls, she also began going from door to door, requesting parents to educate their daughters. Her campaign was so effective that the number of students in the school grew and soon it became necessary to appoint one more teacher. Vishnu Pant Thatte agreed to teach in the school for free. In 1849, Savitribai established an adult education centre in the house of Usman Sheikh, again in Pune, for Muslim women and children. Soon she started new schools in Pune, Satara and Ahmednagar.
India’s first feminist Savitribai’s contributions were not only limited to the field of education. In 1852, she established the Mahila Seva Mandal (Women’s Service Organization) with the objective of improving the lot of Indian women. She was thus the first leader of the Indian feminist movement. The Mandal strongly opposed various social practices that were detrimental to the wellbeing of the women. One such practice was the tonsuring of widows among the Hindus. To put an end to this, she launched a campaign urging the barbers not to cut the hair of widows. A large number of barbers took an oath to stop doing so. There are few, if any, instances in the history of the world of men in large numbers enthusiastically joining a movement against the physical or mental torture of women, that too at financial loss to themselves. Many organisations of barbers made common cause with Savitribai’s Mahila Seva Mandal. She and her comrades in the Mandal launched several such movements with great success. Our history, religious scriptures and social reform movements show that women were valued even less than animals. If a woman became a widow, the men in her family, including brothers-in-law, father-inlaw and others, exploited her physically. Sometimes, such women used to become pregnant. Their tormentors took no time in disowning them and to save themselves from ignominy, they were left with only two options: either to commit suicide or to kill their illegitimate child. To ensure that women
stopped taking either of the two paths, Savitribai established the country’s first Bal HatyaPratibhandhak Griha (home for infanticide prevention) and also a home for destitute women. She persuaded a Brahminwidow Kashibai – who had become pregnant – not to commit suicide and took the woman to her own home where, in due course, she delivered a baby boy. Savitribai adopted the boy and named him Yashwant. She educated him, and he went on to become a doctor. Then he married a woman of another caste in what was the first recorded inter-caste wedding in Maharashtra. Savitribai and Jotiba Phule practised what they preached. In fact, they started the process of social reform from their own home. Savitribai organized and conducted inter-caste marriages all her life with the objective of establishing a casteless and classless society. For almost 48 years, she worked unceasingly for the Dalits and the exploited and suffering women, inspiring them to lead a life of dignity and self-respect.
Poet of liberation India’s first woman teacher and the harbinger of social revolution, Savitribai Phule was also a famous poetess. In one of her well-known poems she urges all to study, break free from
the bondages of caste and throw away Brahmin scriptures. Go, Get Education Be self-reliant, be industrious Work-gather wisdom and riches. All gets lost without knowledge We become animals without wisdom. Sit idle no more, go, get education End misery of the oppressed and forsaken.
You’ve got a golden chance to learn So learn and break the chains of caste. Throw away the Brahmin’s scriptures fast. As a thinker, Savitribai argued that social inequality was not the creation of God; it was the selfish humansthemselves who pronounced some greater than others. Caste, she said, had been created by some to secure their future and to lead a life of luxury. When Savitribai supported inter-caste marriages, her brother wrote to her: “You and your husband have been boycotted. The work you do for Mahars and the Mangs is corrupting your family. That is why I tell you to do what the Bhatt says and work within the caste system.” She hit back at her brother’s conservative views. “My brother, you have a weak brain and it has been further weakened because of the teachings of the Bhatts,” she wrote.
In another letter, she gives a heart-rending description of the famine of 1877. In those difficult times, Savitribai andJotiba Phule not only started Anna Satra but also appealed to the people to donate foodgrains for those affected by the famine. After the death of Jotiba Phule in 1890, Savitribai
continued to serve the needy. In 1897, when plague assumed epidemical proportions in Maharashtra, Savitribai attended to the patients without caring for her own safety. She contracted plague while trying to save a Dalit child, and passed away on 10 March 1897 at the hospital run by her son Yashwant.
Savitribai Phule has become immortal. For the last couple of years, the depressed and exploited classes, for whose rights she struggled all her life, have been observing her birth anniversary as Indian Education Day and her death anniversary as Indian Women’s Day.
                                                            (Published in  Forward Press, January, 2014 Issue)


Forward Press.

Demand to build national memorial at Ambedkar's Parinirvan bhoomi

NEW DELHI: On 6 December, the death anniversary of Dr. Bhimrao Ambedkar, a national Samman rally was held at 26, Alipur Road– the place where he had passed away. His followers, Bhim Sainiks and workers reached here in large numbers to join the rally and raise the demand for the construction of a memorial at Parinirvan bhoomi. On this occasion, Dr. Satyanarayan Jatia, Charan Singh Atwal, Ramdas Athavale, H.Hanumanthappa, Satya Behen, Udit Raj, TM Kumar and Indresh Gajbhiye urged the UPA government to build a memorial at the place. They alsodemanded to know what had become of the Rs 100 crore allocated by the NDA government in 2003 for the construction of the nationalmemorial. The work is
yet to begin.
            -Sohan Singh
                                                    (Published in  Forward Press, January, 2014 Issue)

Forward Press.

Tuesday, 25 February 2014

नेल्सन रोलिहलाहा मंडेला : 18 जुलाई, 1918-5 दिसंबर, 2013 गांधी से अधिक आम्बेडकर के नजदीक

विद्याभूषण रावत
नेल्सन मंडेला नहीं रहे। 6 दिसंबर की सुबह, जब भारत अपने संविधान निर्माता डॉ. आम्बेडकर को याद करने की तैयारी कर रहा था, तभी मंडेला की मृत्यु की खबर आई। मंडेला ने रंगभेद की समाप्ति के बाद के दक्षिण अफ्रीका की नींव रखी थी। पूरी दुनिया में उनकी मृत्यु का शोक मनाया जा रहा है परंतु अफ्रीकी उनके जीवन का उत्सव मना रहे हैं। पश्चिमी देश, जिन्होंने अफ्रीका और दुनिया के अन्य हिस्सों में मानवाधिकारों का जमकर उल्लंघन किया है, मंडेला का गुणगान करते नहीं थक रहे हैं।
उनको दी जा रही श्रद्धांजलियों में जो एक बात समान है वह यह कि वे इसलिए महान थे क्योंकि वे 'बदला लेने' में विश्वास नहीं रखते थे और वे 'एकीकृत' दक्षिण अफ्रीका के निर्माता थे। भारतीयों ने मंडेला को अपना मित्र बताने में देरी नहीं की। हमारे देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और कई नेताओं ने बार-बार दोहराया कि मंडेला ने गांधी से बहुत कुछ सीखा था।
हम भारतीय, पश्चिमी देशों के नागरिकों से कहीं अधिक पाखंडी हैं। यद्यपि यह सच है कि जवाहरलाल नेहरू ने दक्षिण अफ्रीका की रंगभेदी सरकार की स्पष्ट शब्दों में आलोचना की थी परंतु यह भी उतना ही सच है कि हमने उस सरकार को उखाड़ फेंकने की पर्याप्त कोशिश नहीं की। हम हमारे देश के अदृश्य रंगभेद को भुलाकर अफ्रीका के बारे में ढेर सारी बातें कह सकते हैं परंतु हमारे ही लोगों को सत्ता के ढांचे में उचित प्रतिनिधित्व देना हमें मंजूर नहीं है। मंडेला को दी गई श्रद्धांजलियों से भी भारत में व्याप्त जातिगत घृणा स्पष्ट झलकती है।
एक के बाद एक बड़े-बड़े नेताओं ने कहा कि मंडेला पर गांधीवादी मूल्यों का गहरा प्रभाव था। यह कहना मुश्किल है कि गांधी ने अफ्रीका के दिन-रात कमरतोड़ मेहनत करने वाले आम अश्वेतों के लिए क्या किया। जब गांधी अफ्रीका में थे तब भी उनका संघर्ष अश्वेतों के लिए नहीं वरन् वहां के भारतीय समुदाय के लिए था, जिनमें से अधिकांश गुजराती व्यवसायी थे। वे आज भी अफ्रीका के बड़े हिस्से में प्रभावशाली हैं और गोरों से कम नस्लवादी और जातिवादी नहीं हैं।
दूसरे, भारत में दक्षिण अफ्रीका की तुलना में कहीं बड़े पैमाने पर भेदभाव होता है। भारत के लगभग 16 करोड़ नागरिक अदृश्य रंगभेद के शिकार हैं, जिसे 'दैवीय' स्वीकृति प्राप्त है। संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद, इनके अधिकारों की रक्षा करने में हम अक्षम रहे हैं और उनके साथ अन्याय बहुत आम है। मंडेला सन् 1990 में भारत आए थे। वह स्वाधीन भारत का सबसे उथल-पुथल भरा साल था। उस साल ओबीसी को आरक्षण देने की पुरानी मांग पूरी हुई थी और समाज के हाशिए पर पटक दिए गए एक तबके को शासन व्यवस्था में हिस्सेदारी करने का मौका मिला था। उसी साल भारत के संविधान निर्माता को सरकार ने देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया। वीपी सिंह सरकार ने बाबा साहब आम्बेडकर और नेल्सन मंडेला को एक साथ भारत रत्न से विभूषित किया। भारत रत्न से विभूषित लोगों की सूची में ये दो नाम अलग नजर आते हैं क्योंकि अधिकतर मामलों में इन पुरस्कारों का प्रयोग, श्रेष्ठी वर्ग अपने हितों की रक्षा के लिए करता रहा है। सन् 1990 में पहली बार ऐसा लगा कि सही लोगों को भारत रत्न दिया गया है।
इसके बाद भी हमारे किसी विश्लेषक या टिप्पणीकार ने आम्बेडकर की पुण्यतिथि 6 दिसंबर को भी, मंडेला और आम्बेडकर के बीच समानताओं की चर्चा नहीं की। आम्बेडकर ने अकेले दलितों के अधिकार की लड़ाई लड़ी। ये दलित आज भी भेदभाव और पूर्वाग्रहों के शिकार हैं। प्रधानमंत्री ने गांधी का नाम लिया क्योंकि हमारे देश में हर नेता के लिए गांधी और नेहरु का नाम जपना अनिवार्य है। इन दोनों के नाम पर अनेक पुरस्कार स्थापित किए गए हैं। अगर मंडेला को आम्बेडकर को पढऩे का समय मिला होता तो मुझे विश्वास है कि वे आम्बेडकर के लंबे संघर्ष की सराहना करते। अगर दक्षिण अफ्रीका के अश्वेत आज भी परेशानियां भोग रहे हैं और अगर भारत के दलितों को आज भी गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार नहीं है तो फि र तथाकथित 'सत्ता हस्तांतरण' व 'समावेशी प्रजातंत्र'का क्या अर्थ है ? तथ्य यह है कि सत्ताधारी श्रेष्ठी वर्ग ने 'समावेशी प्रजातंत्र' को एक ऐसी व्यवस्था में बदल दिया है, जिसमें सत्ता, प्राकृतिक संसाधनों और देश की संपदा पर केवल उनका अधिकार हो गया है।
अब, जब कि मंडेला नहीं रहे, यह जरूरी है कि हम उन्हें भगवान न बनाएं। उनकी विरासत की आलोचनात्मक विवेचना आवश्यक है ताकि उन्होंने जो स्वाधीनता आंदोलन चलाया था, उसे सिर्फ  'माफ  करो और भूल जाओ'के खांचे तक सीमित न कर दिया जाए।
                                               (Published in  Forward Press,  Jan, 2014 Issue)

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पटवा समाज : शुद्धता के फेर में पड़े इंजीनियर

आशीष
पारसी समुदाय की तरह बिहार का पटवा समाज भी अन्य जातियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया है। समाज के सदस्यों की मेहनत रंग ला रही है। पारंपरिक रूप से बुनकर, अत्यंत पिछड़ी जाति के अंतर्गत आने वाला गया का यह समाज आज बड़ी संख्या में इंजीनियर पैदा करने के लिए जाना जाता है। मात्र 15,000 की आबादी वाला यह समाज 1996 से लेकर अब तक 400 से ज्यादा आईआईटी इंजीनियरों को पैदा कर चुका है।
लगभग 1,200 घरों में रहने वाले पटवा समाज के सदस्यों में से कुछ पूरी तरह से पावरलूम के पेशे पर आश्रित है। समाज में पढने-लिखने का चलन पहले ना के बराबर था। वर्ष 1971 में पहली मर्तबा समाज के रामलगन प्रसाद ने आईआईटी की परीक्षा उत्तीर्ण की और आईआईटी खडग़पुर में आर्किटेक्ट बने, लेकिन घर में डकैती हो जाने से वो आगे की पढाई जारी नहीं रख सकें। वर्ष 1996 में ठाकुर प्रसाद के बेटे जितेंद्र कुमार से लेकर वर्तमान के 2013 तक इस समाज के कुल 400 युवा आईआईटी के क्षेत्र में देश व विदेश में अपनी सफ लता का झंडा गाड़ चुके हैं, जिसमें 19 छात्र अमेरिका में कार्यरत हैं।
लेकिन वहीं दूसरी ओर यह समाज उतना ही परंपरावादी और रूढिवादी भी है। अमेरिका और कनाडा में भी नौकरी कर रहे युवाओं को अपने ही समाज में आकर शादी करनी पड़ती है। अंतर्जातीय विवाह की यहां सख्त मनाही है, क्योंकि समाज के बुजुर्गों को यह आशंका सताती है कि इससे उसकी जातीय संरचना गड़बड़ा जाएगी। पटवा समाज के बुजुर्गों की इस आशंका में कितना दम है यह तो हम नहीं जानते, लेकिन एक बात सच है कि कहीं पटवा समाज भी उस गति को न प्राप्त कर जाए जिस गति को आज भारत का पारसी समुदाय प्राप्त कर चुका है और अपनी जातीय श्रेष्ठता को बरकरार रखने के चक्कर में लगभग विलुप्ति के कगार पर पहुंचता जा रहा है।
पावरलूम संचालक हेमंत कुमार से मुलाकात हुई तो उन्होंने बताया कि पटवा समाज करीब 200 से अधिक सालों से रूढिवादी तरीके से जीता आ रहा है, मसलन समाज के लोग जाति से बाहर जाकर शादी-विवाह नहीं कर सकते। अगर ऐसा होता है तो समाज के पंचायत द्वारा उसका बहिष्कार कर दिया जाता है। उन्होंने बताया कि पंचायत द्वारा अब तक कई लोगों का बहिष्कार किया जा चुका है। वहीं 57 वर्षीय मेघनाथ प्रसाद बताते हैं कि जाति से बाहर जाकर शादी करना पटवा संस्कृति व परंपरा के खिलाफ  है। वे यह भी बताते हैं कि हालांकि लड़कियों को कोई 20 साल पहले तक परिवार की माली हालत को देखते हुए जाति से बाहर शादी करने की छूट पंचायत द्वारा मिली हुई है, लेकिन लड़कों को यह छूट बिल्कुल भी नहीं है। वो यह भी बताना नहीं भूलते कि पटवा समाज जो गौरिया पटवा समाज के नाम से जाना जाता है, अंतर्जातीय विवाह नहीं होने के कारण ही आज भी सुरक्षित है। वो बताते हैं कि पटवा समाज ही एक ऐसा समाज है, जहां दहेज प्रथा पूरी तरह से निषेध है, जिसके कारण पटवा समाज की गरीब लड़की की शादी भी अमेरिका व कनाडा में काम कर रहे समाज के लड़के के साथ आसानी से हो जाती है। हालांकि एक बात यहां महत्वपूर्ण है कि मानपुर स्थित इस समाज के लोगों की शादी मुख्य तौर पर मानपुर, चांकद व डंगरा स्थित रहने वाले पटवा समाज के अलावा पूरे राज्य व देश में कहीं भी नहीं होती है। बातचीत के क्रम में कई बार चूड़ामणि पाटेश्वरी यह कहने से नहीं चूकते कि आज इस टोले में रहने वाली अगड़ी जाति के अभिभावक भी अपने बच्चों के भविष्य को लेकर उन्हीं के पास राय-मशविरा करने आते हैं। हालांकि इस मसले पर समाज की युवा पीढ़ी कहती है कि जिस प्रकार उनके अंदर शिक्षा को लेकर चेतना का भाव पैदा हुआ, उसी तरह रूढि़वादिता को लेकर भी एक दिन समाज के अंदर बदलाव होगा।

                                                      (Published in  Forward Press,  Jan, 2014 Issue)


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सावित्रीबाई के कार्यों को आगे बढ़ाती 'क्रांतिज्योति'

प्रतिक्षा दापूरकर/अमरेंद्र यादव
'क्रांतिज्योति' सावित्रीबाई फुले द्वारा प्रज्ज्वलित ज्योति को पुणे के एक स्वयंसेवी महिला संगठन ने आज भी जलाए रखा है। पुणे ही वह शहर था जहां भारत की सामाजिक क्रांति की शुरुआत हुई। अग्रसेन हाई स्कूल रोड पर येरवडा नामक एक भवन में एक मामूली से घर में स्थित इस संगठन का नाम 'क्रांतिज्योति'उचित ही है क्योंकि यह संस्थान भारत की पहली शिक्षिका सावित्रीबाई फुले के कार्यों को आगे बढ़ाने का कार्य कर रही है। यह घर महिलाओं ने किराए पर ले रखा है।

'क्रांतिज्योति' नाम से चलने वाली इस संस्था की विशेषता है कि इसमें कार्य करने वाली महिलाएं दलित-बहुजन समुदायों से आती हैं और अपने अस्तित्व को बचाने की खातिर बजाब्ते प्रशिक्षित और संगठित होकर अपनी लड़ाई लड़ रही हैं। संस्था की महिलाओं का मानना है कि महिलाओं के साथ गांव और शहर दोनों ही जगह भेदभाव बरतने का प्रतिशत बहुत ही ज्यादा है। राष्ट्रपिता जोतिबा फुले और डॉ. बाबा साहेब आम्बेडकर के आंदोलन में महिलाओं की आजादी और उनके विकास के मॉडल से ये प्रेरणा लेती हैं और उनकी धरोहर को जीवित रखते हुए इस संस्था के लिए कार्य कर रही हैं। वे कहती हैं कि भारत के संविधान में सभी जाति, धर्म, वर्ग और लिंग के लोगों को समान अधिकार तो दे दिए गए हैं परंतु सामाजिक जीवन में आज भी विषमतावादी व्यवस्था के समर्थकों ने महिलाओं को उनके अधिकारों से दूर ही रखा है। इस वजह से महिलाएं हमेशा के लिए दूसरों पर निर्भर और हताशा भरी जिंदगी जीने को विवश रहती हैं।

महिलाओं को हताशा भरी जिंदगी से उबारने के लिए महाराष्ट्र के उत्तरपूर्वी जिले अमरावती के यशोदा नगर में पली-बढी अर्चना नामक एक युवती ने कुछ स्थानीय महिलाओं के साथ मिलकर 'क्रांतिज्योति' नामक संगठन की नींव डाली। अर्चना संगठन की संचालिका भी हैं जिनके अनुसार 'महिलाओं में निर्भिकता और आत्मविश्वास जगाना 'क्रांतिज्योति' की प्राथमिकता है क्योंाकि जब महिलाओं में आत्मविश्वास आ जाएगा तो वे स्वयं, परिवार और अपने समुदाय की समस्याओं को जानने का प्रयास कर समाधान के लिए भी पहल करेंगी। महिलाएं 'क्रांतिज्योति' के कार्यालय में आकर प्रशिक्षण लेती हैं। अर्चना संगठन की कार्यपद्धति पर प्रकाश डालते हुए कहती हैं, जोतिबा और सावित्रीबाई फुले के विचारों को बढावा देकर महिलाओं में शिक्षा, सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना भरना ही मूल उद्देश्य है। वह कहती हैं, 2010 में शादी के बाद कुछ रकम उधार लेकर किराये पर मकान लिया और अपने उद्देश्य को पूरा करने में लग गया। आज वह एक उत्कृष्ट विचारधारा वाली संस्?था को ट्रस्ट में पंजीकृत कर महिलाओं को सक्षम, साक्षर, निडर और अपने आप को लीडर बनाने का कार्य कर रही है
'क्रांतिज्योति'ने समुदाय स्तर पर नेतृत्व विकास कार्यक्रम (सीएलटीपी) का आयोजन कर एक श्रृंखला बनाई। इस नेतृत्व विकास कार्यक्रम की वजह से आज बहुजन महिलाएं खुद की समस्याएं सुलझाने में सक्षम हुई हैं, साथ ही वह बस्ती या समुदाय के प्रश्नों की तरफ भी ध्यान देने लगी हैं। कई महिलाएं जिन्होंने घर की गली तक ठीक से देखी नहीं थीं और अपना नाम तक बताने से घबराती थीं, आज वह कार्यक्रमों, आंदोलनों में अपनी समस्यारओं के बारे में खुलकर चर्चा करती हैं और समस्या के समाधान के लिए पहल भी करती हैं।
'क्रांतिज्योति'महिलाओं को रोजगार देने के लिए भी कृतसंकल्पित है। इस संगठन के साथ जुड़ी महिलाएं 'उद्योग का विकास' का प्रशिक्षण लेकर खुद अपना खर्च उठाने में सक्षम हो रही हैं। 'क्रांतिज्योति' में आठ महिलाएं पूर्णकालिक कार्यकर्ता बनी हुई हैं और 40 से ज्यादा स्वयंसेवक के तौर पर कार्य कर रही हैं। इतना ही नहीं, यहां 600 से भी ज्यादा महिलाओं का एक मजबूत नेटवर्क भी बना है। इस तरह हम कह सकते हैं कि सही मायने में 'क्रांतिज्योति' महिलाओं की जीवन स्थिति को सुधारने में सावित्री बाई फुले के सपनों को पंख देने का कार्य कर रही है। उनकी सबलता के लिए यहां अलग-अलग विभाग भी बने हुए हैं और इस उद्देश्य से 'क्रांतिज्योति'स्टडी एवं ट्रेनिंग सेंटर (केएसटीसी) और रमाई व्यावसायिक ट्रेनिंग एवं बिजनेश सेंटर(आरवीटीसी) नामक दो मुख्य कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर 'क्रांतिज्योति' विचार मंच के तहत नेटवर्क से बाहर की महिलाओं के साथ भी संवाद स्थापित करती है। विचार मंच के तहत चर्चा सत्र, स्पर्धा, शिविर तथा कार्यशाला के माध्यम से जागरुकता कार्यक्रम नियमित रूप से चलता रहता है। इतना ही नहीं संस्था शिक्षा को बढावा देने के लिए 'क्रांंतिज्योति स्कॉलरशीप योजना' के तहत सातवीं, आठवीं और नौंवी के विद्यार्थियों के बीच एक परीक्षा का आयोजन कर 9 छात्राओं को दो-दो हजार की छात्रवृत्ति भी प्रदान करती है। सामाजिक, मानसिक, शैक्षणिक, आर्थिक, स्वास्थ्य तथा व्याक्तित्व विकास के लिए संस्था की संचालिका अर्चना ने एक साप्ताहिक पत्रिका भी शुरू की थी जो आर्थिक परेशानियों की वजह से 16 अंक निकलने के बाद बंद हो गई। आज भी सैकड़ों मुश्किलों के बावजूद 'क्रांतिज्योति'हर महिला में क्रांतिज्योति जला सावित्रीबाई फूले के सामाजिक कार्यों की परंपरा को आगे बढा रही है।
                                                      (Published in  Forward Press,  Jan, 2014 Issue)
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अलविदा सच्चे टार्जन !

अक्षय नेमा मेख
1959 में  बस्तर का नाम अपनी कला से दुनिया में रोशन करने वाले चेंदरू 18 सितंबर, 2013 को इस दुनिया को अलविदा कह गए। चेंदरू राम मण्डावी वही शख्स हैं जो बचपन में बाघ के साथ खेला करते थे और उसी के साथ अपना अधिकतर समय बिताते थे। बाघों से उनकी इस दोस्ती से प्रभावित होकर 1959 में ही सुप्रसिद्ध स्वीडिश फिल्मकार अर्ने सक्सडॉर्फ ने चेंदरू और उसके पालतू शेर को लेकर एक फिल्म बनाई, जिसका नाम 'ए जंगल टेल' रखा। इस फिल्म ने पूरी दुनिया में धूम मचा दी। वहीं सक्सडॉर्फ की पत्नी और सुप्रसिद्ध स्वीडिश जन्तुविज्ञानी स्टेन वर्गमैन की पुत्री ऑस्ट्रिड सक्सडॉर्फ ने उसी दरम्यान एक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक का सर्वप्रथम प्रकाशन 1960 में फ्रांस से 'चेंदरू एट सन टाइगर'शीर्षक से तथा अंग्रेजी उपन्यासकार विलियम सैनसम द्वारा अंग्रेजी में किया गया अनुवाद यूनाइटेड स्टेट्स (हैरकोर्ट ब्रेस एंड कम्पनी, न्यूयार्क) से 'चेंदरू : द ब्वॉय एंड द टाइगर' शीर्षक से हुआ। इस कारण लोगों ने उन्हें 'टाईगर ब्वॉय टार्जन' और 'मोगली'जैसे नाम देने शुरू कर दिए थे।

फिल्म के प्रदर्शन के समय फिल्म निर्माता चेंदरू को भी अपने साथ स्वीडन समेत दूसरे देशों में ले गए। इस आदिवासी बालक की इस दौरान जैसे पूरी दुनिया ही बदल गई थी। मगर गढ़बेंगाल गांव के चेंदरू जब भारत वापस आए तो कई सालों तक यहां अनमने से रहे। गांव के लोगों से अलग-थलग और बदहवास, जिसके चलते वे बीमार रहने लगे और धीरे-धीरे बिगड़ते स्वास्थ्य के साथ वे पक्षाघात का शिकार हो गए। अपने अंतिम दिनों में जगदलपुर के सरकारी अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझते 'टाइगर ब्वॉय' की बदहाली और बदहवासी को मीडिया में कुछेक सुर्खियां तो मिलीं मगर जल्दी ही सब कुछ भुला दिया गया। अस्पताल में भर्ती 78 वर्षीय चेंदरू की स्थिति जब गंभीर बनी हुई थी, उस वक्त कोई उनकी मदद के लिए सामने नहीं आया। चेंदरू के बेटे जयराम मण्डावी को लगता है कि यदि उनके पिता को आर्थिक सहायता मिलती तो शायद वे कुछ वर्ष और जीते। जयराम बताते हैं की 'जब पिताजी बीमार पड़े तो एक जापानी महिला ने डेढ़ लाख रुपये की मदद की। इसके अलावा प्रदेश के एक मंत्री ने 25 हजार रुपये दिए लेकिन इसके बाद किसी ने हमें पूछा तक नहीं।'

अफसोस कि छत्तीसगढ़ को विश्व पटल पर पहचान दिलाने वाला यह शख्स गुमनामी की जिंदगी जीता हुआ मर गया। उसकी अंतिम पुकार या कहे अंतिम दहाड़ न तो राजनीतिक मुद्दा बनी और न ही स्वप्न का खजाना दिखाने वाले मीडिया में चर्चा का विषय बन पाई। चेंदरू को शूटिंग के दौरान रोजाना दो रुपये मिला करते थे। एक बार तो मुंबई में उनकी मुलाकात भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु से हुई थी तब नेहरु जी ने उन्हें पढने-लिखने पर नौकरी देने का भरोसा दिलाया था। तब उसे नहीं मालूम था की वह सरकारी सहायता के इतने करीब फिर कभी नहीं पहुंचेगा।

राज्य व केंद्र सरकार द्वारा चेंदरू के लिए कुछ न करना निश्चय ही अफसोसनाक है। विडंबना यह है कि मौजूदा दौर में मानवाधिकार और आदिवासी संस्कृति के संरक्षण की बात करके बस्तर जैसी जगहों पर डेरा जमाने वाले हमारे सैकड़ों सामाजिक कार्यकर्ताओं व गैरसरकारी संगठनों को भी 'टाइगर ब्वॉय'की आवाज सुनाई क्यों नहीं दीं ? अस्पताल के बिस्तर पर पड़े चेंदरू के खामोश चेहरे और दर्द भरी आंखों ने उन्हें क्यों नहीं झकझोरा ?

-अक्षय नेमा मेख फारवर्ड प्रेस के संवाददाता हैं

Forward Press                                   (Published in  Forward Press, Jan2014ssue)






Tuesday, 7 January 2014

‘India is a land of many cultures’

                                                                                                     -Sohan Singh  
MUZZAFARPUR (Bihar): A national seminar ‘Shared Culture Versus Terrorism’ was organized by Akhil Bharatiya Sarvjan Sanskriti Manch, Tirhut, at the Senate Hall of BRA University here on 5 December. Dr Nand Kishore Singh, Dean, Students’ Welfare, inaugurated the meet and welcomed the guests. Among others, Yugal Kishore Sharan Shastri, a key CBI witness in Babri Masjid demolition case, Manch’s convener Harinarayan Thakur, member of the Manch’s panel of conveners Ramesh Pankaj, Prof Urmila Shukla of Chhattisgarh, Dr Abjur Kamaluddin, Principal of Nitishwar College and Pramila Verma, Divya Verma and Iqbal Shami from Maharashtra addressed the meet. Vikas Narayan Upadhyay delivered the welcome address while Hem Narayan Vishwakarma proposed a vote of thanks.
                                                                 (Published in  Forward Press,  Jan, 2014 Issue)
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महात्मा ज्योतिबा फूले की पुण्यतिथि पर किए श्रद्घा सुमन अर्पित

  संजय मान
नारनौल, 28नवम्बर। देश के महान समाज सुधारक महात्मा ज्योतिबा फूले की 123वीं पुण्य तिथि पर स्थानीय सैनी वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में एक समारोह का आयोजन किया गया। इस मौके पर सैनी सभा के वरिष्ठ उप प्रधान जयराम आढ़ती ने महात्मा ज्योतिबा फूले के चित्र पर पुष्प अर्पित करके विधिवत रूप से कार्यक्रम की शुरूआत की। स्कूल के प्राचार्य चौधरी सुरेशपाल की अध्यक्षता में संपन्न हुए इस समारोह में सैनी सभा की कार्यकारिणी के पदाधिकारियों व सदस्यों ने भी शिरकत की। समारोह के मुख्य अतिथि जयराम आढ़ती ने अपने संबोधन में विद्यार्थियों को आह्वान किया कि वे महात्मा ज्योतिबा फूले के जीवन से प्रेरणा लेते हुए उनके बताए मार्ग पर चलकर समाज का उत्थान करने में अपना सहयोग करें। सभा के मीडिया प्रभारी रामचंद्र सैनी ने बताया कि महात्मा फूले की पुण्यतिथि के अवसर पर कार्यक्रम के अंत में स्कूल में पढऩे वाले आर्थिक रूप से कमजोर 40 छात्र-छात्राओं को स्कूल की तरफ से स्वेटर भी वितरित किए गए। वहीं इसी कड़ी में महात्मा ज्योतिबा फूले विकास मंच जिला महेन्द्रगढ़ ने भी स्थानीय वाल्मीकि मंदिर में महात्मा ज्योतिबा फूले की 123वीं पुन्यतिथि बड़ी श्रद्घा और आदर के साथ मनाई। कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए महात्मा ज्योतिबा फूले विकास मंच के जिला अध्यक्ष मा. जयप्रकाश सैनी, सैनी सभा के पूर्व प्रधान रामसिंह सैनी, संजय अमन तथा डा. सुशील शीलू ने महात्मा ज्योतिबा फूले के जीवन पर प्रकाश डाला। वक्ताओं ने कहा कि ज्योतिबा फूले ने समस्त पिछड़े व दलित वर्ग के उत्थान के लिए काम किया था। उन्होंने कहा कि महापुरूष किसी एक समाज के न होकर समस्त राष्‍ट्र के होते हैं। उन्होंने कहा कि सावित्री बाई फूले देश की पहली शिक्षिका बनी व महिलाओं की दशा सुधारने के लिए उन्होंने अनेक आंदोलन चलाए। उन्होंने बाल-विवाह, बे-मेल विवाह, बहु विवाह तथा विधवा मुंडन का भी विरोध किया। उन्होंने कहा कि पिछड़ा व दलित वर्ग शिक्षा से कोसो दूर है इसलिए अन्याय सहने का मजबूर है। समाज का विकास शिक्षा के प्रचार व प्रसार से ही होगा। महापुरूषों की कुर्बानी तभी सार्थक होगी जब हम उनके विचारों का प्रचार करके उनके विचारों को जीवित रखेगें।
                                                             (Published in  Forward Press,  Jan, 2014 Issue)
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बिगाड़ा खेल : साहू समाज ने भाजपा का, सतनामियों ने कांग्रेस का

नीलम शुक्ला
पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा की सबसे कमजोर कड़ी माने जाने वाले छत्तीसगढ़ में शुरुआती नतीजों में कांग्रेस से कांटे की टक्कर हुई, घंटों असमंजस की स्थिति रही, अंत में चाउर वाले बाबा यानी रमन सिंह का जादू चला और भाजपा को फिर से अगले पांच वर्ष के लिए जनादेश मिल गया। 90 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा ने 49 सीटों पर कब्जा कर लिया है। इस बार भी कांग्रेस का सत्ता में वापसी का सपना मात्र सपना बनकर ही रह गया। कांग्रेस पिछले चुनाव के मुकाबले दो सीटें अधिक जीतते हुए 39 पर अटक गई। एक सीट निर्दलीय और दूसरी बसपा के खाते में गई है।

कांग्रेस की धार कुंद हुई
छत्तीसगढ़ की सत्ता की चाबी कहलाने वाले बस्तर को इस बार वह सम्मान नहीं मिल पाएगा, क्योंकि यहां 8 सीटों पर कब्जा जमाने के बावजूद कांग्रेस सत्ता से अब तक दूर ही है। वर्ष 2008 के चुनाव में भाजपा ने बस्तर के 12 में से 11 क्षेत्रों में विजय हासिल की थी पर इस बार बस्तर की 12 में से भाजपा केवल चार सीटों पर ही विजय हासिल कर पाई। इधर कांग्रेस जो पिछली दफा केवल एक सीट कोंटा पर ही अपनी उपस्थिति दर्ज करा पाई थी। गौरतलब है कि कांग्रेस ने अपना सारा ध्यान बस्तर पर ही टिकाए रखा था। लिहाजा बस्तर में तो कांग्रेस ने अपना डंका बजा लिया, किन्तु प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में वह पिछड़ गई। मैदानी इलाके में सतनामी दलितों का टूटा भरोसा नहीं जीत पाई और यही कुछ हद तक उसको सत्ता से दूर ले गई। चुनाव-पूर्व बनी एक नई इकाई, दलित पुरोहितों की सतनाम सेना, ने यहां अपना असर दिखाया। सेना ने, जिसे कथित रूप से भाजपा का समर्थन हासिल था, सभी दलित चुनाव क्षेत्रों से सतनामी उम्मीदवारों को लड़वाया, और इस प्रकार कांग्रेस के वोट काटे, जिसके चलते भाजपा ठीक बीच में आई और जीत गई।

कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ में पहले से ज़्यादा मेहनत की थी। उसकी छत्तीसगढ़ में सीटें भी बढ़ी हैं। छत्तीसगढ़ में ही कांग्रेस की सबसे अच्छी स्थिति बनी। उसके कई कारण हैं। पार्टी ने अपनी समझ से यथासंभव बेहतर उम्मीदवारों को टिकट दिए। क्षेत्रीय गुटों को समायोजित किया गया। पर फिर भी असंतोष कांग्रेस की कुछ टिकटों पर रहा है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने 39 विधायकों में से चार के टिकट काटे। बचे 35 विधायकों में 27 हार गए। दुर्ग सीट पर पार्टी के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा के कारण उनके बेटे को तीन बार हारने के बाद भी टिकट दिया गया पर इस बार अरुण ने यह सीट जीतकर पिता की इज्जत बचा ली।

मानपुर मोहला के कांग्रेसी विधायक शिवराज उसारे का टिकट काटकर वोरा के कारण लगभग अनजान महिला तेजकुंवर नेताम को उम्मीदवार बनाया गया, वह जीती भी पर पार्टी का असंतोष साफ तौर पर दिखा। कहने का तात्पर्य यह कि इस बार कांग्रेस ने आदिवासियों को तो साध लिया पर परंपरागत वोट बैंक से वह दूर हो गए। उनको न तो सतनामियों का साथ मिला और न ही मुस्लिमों का। सतनामी समाज सत्ता की बिसात को बनाने और बिगाडऩे में अहम भूमिका निभाता है। आदिवासी सीटों की बात छोड़ दें तो सतनामी वर्ग प्रदेश की हरेक विधानसभा में मौजूद है लेकिन 90 में से 10 विधानसभाओं में सतनामी समाज का सीधा दखल है। इन इलाकों में बगैर सतनामियों को रिझाए कोई चुनाव नहीं जीता जा सकता। इन विधानसभा क्षेत्रों में मुंगेली, मस्तूरी, नवागढ़, अहिवारा, डोंगरगढ़, बिलाईगढ़, आरंग, सारंगढ़, सराईपाली और पामगढ़ शामिल हैं। इस बार कांग्रेस के खाते में इस समाज की 10 सीटों में से मात्र एक सीट गई है। इसी तरह कांग्रेस के दो मुस्लिम विधायक मोहम्मद अकबर और बदरुद्दीन कुरैशी सक्रियता के बावजूद हार गए। कई चुनावों में लगातार अविजित नेतापक्ष रविन्द्र चौबे और सबसे वरिष्ठ विधायक रामपुकार सिंह व बोधराम कंवर को भी इस बार पराजय का घूंट पीना पड़ा। छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले में सबसे अप्रत्याशित हार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रवींद्र चौबे की हुई है। अविभाजित मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वीसी शुक्ल के भतीजे अमितेश शुक्ला भी परिवार के गढ़ माने जाने वाले रजिम से हारे। कांग्रेस के ये सभी दिग्गज उन सीटों पर हारे जहां नई-नवेली सतनाम सेना ने उम्मीदवार उतारे।

भाजपा गिरते-पड़ते जीत ही गई
सरकार बनाने वाली भाजपा को भी सत्ता जरूर मिल गई है पर कई जातियों और जनजातियों का उन पर से विश्‍वास डगमगाया है। इसमें साहू जाति प्रमुख है। छत्तीसगढ़ में रहने वाले पिछड़े वर्ग की आबादी 27 फीसदी है। इसमें सबसे संगठित तौर पर साहू समाज ही उभरकर सामने आया है। 90 में से 34 सीटों पर साहू समाज के मतदाता प्रभावशाली संख्या में हैं और इनमें से भी 24 सीटों का पूरा नतीजा यह समाज ही तय करता है। सरकारी आंकड़े के मुताबिक 27 लाख साहू मतदाता हैं और 24 सीटें ऐसी हैं जहां सारे राजनीतिक समीकरण साहू समाज के इर्द-गिर्द ही घूमते हैं। भाजपा का साथ देने वाला साहू समाज भाजपा की एक बड़ी नेता के कारण अब भाजपा से दूरी बना रहा है जो विधानसभा चुनाव में भी साफ दिखा। साथ ही स्व. ताराचंद साहू का भाजपा छोड़कर नई पार्टी बनाना भी साहू समाज को भाजपा से दूर ले गया। ताराचंद की छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच के कमजोर हो जाने के बावजूद इन चुनावों में भाजपा के केवल दो साहू उम्मीदवार, रमशीला साहू व अशोक साहू ही जीत सके। मंत्री चंद्रशेखर साहू को हार का सामना करना पड़ा।

इसी तरह पूर्व विधानसभा अध्यक्ष प्रेमप्रकाश पांडे और पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर की वापसी से नए सत्ता समीकरण खुलेंगे। वैसे अगर गौर किया जाए तो छत्तीसगढ़ भाजपा में व्यवसायी विधायकों ने शिकंजा पहले से ज़्यादा कस लिया है। धाकड़ विधायक बृजमोहन अग्रवाल सहित अमर अग्रवाल, रोशनलाल अग्रवाल, संतोष बाफना, राजेश मूणत, गौरीशंकर अग्रवाल, लाभचंद बाफना, विद्यारतन भसीन, श्रीचंद सुंदरानी और शिवरतन शर्मा वगैरह इसका प्रतिनिधित्व करते हैं।
सच यह भी है कि छत्तीसगढ़ में जातिगत आधार पर बदले राजनीतिक समीकरण सिर्फ विधानसभा तक ही सीमित नहीं रहेंगे बल्कि वृहद् रूप लेकर अपना असर 2014 के लोकसभा चुनाव में भी दिखाएंगे। बदलते जातिगत समीकरण किसी भी राजनीतिक दल के समीकरण बना व बिगाड़ सकते हैं इसमें कोई शक नहीं। अब देखना यह है कि यह समीकरण किसको कितना फायदा पहुंचाते हैं और किसको कितना नुकसान।
                                                                 (Published in  Forward Press,  Jan, 2014Issue)

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